नेहरू के दादा को देखा है, नहीं देखा है तो देख लीजिये, कांग्रेस इनको पंडित (हिन्दू) बताती है

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ऊपर की ये दोनों तस्वीरें इलाहबाद स्तिथि “आनंद भवन” में आज भी लगी हुई है, अगर किसी को शक है तो वो इलाहबाद में आनंद भवन जाकर, या इलाहबाद में कोई सगा संबंधी या जानने वाला हो तो वहां भेजकर इसकी पुष्टि कर सकता है

ऊपर तस्वीर में आपको 2 शख्स दिखाई देंगे आपको थोड़ी साफ़ तस्वीर दिखाते है, इस इंसान को देखिये

इसी शख्स की 1 और तस्वीर देखिये

आपको पठानी सूट और मुस्लिम टोपी पहना हुआ 18वीं सदी का ये शख्स किसी भी एंगल से ब्राह्मण हिन्दू लग रहा है ?आपको 1857 के मुग़ल बहादुर शाह ज़फर की एक तस्वीर दिखाते है, ध्यान से देखिए

उस ज़माने में मुसलमान लोग, मुस्लमान शासक, सैनिक, कोतवाल इस तरह की भेषभूषा रखते थे, इस तरह की टोपी सर पर पहनते थे

इलाहबाद के आनंद भवन में जो नेहरू का घर था, उसमे ये तस्वीर लगी हुई है, और इस तस्वीर के नीचे हिंदी और अंग्रेजी में लिखा हुआ है “नेहरू के दादा गंगाधर नेहरू” ये नेहरू के सगे दादा की तस्वीर है, जो आपको देखने में किसी भी एंगल से ब्राह्मण तो दूर किसी भी जाति का हिन्दू नहीं लगेगा, पर कांग्रेस के मुताबिक ये एक ब्राह्मण हिन्दू है जिसका नाम था “गंगाधर नेहरू”

ये शख्स तो असली है पर इसका नाम गंगाधर नहीं बल्कि गयासुद्दीन था जी हां गयासुद्दीन ग़ाज़ी, अफगानिस्तान का मुस्लिम, जिसके अब्बू अफगानिस्तान से कश्मीर आये, फिर नौकरी के तलाश में दिल्ली आ गए, गयासुद्दीन ग़ाज़ी का जन्म दिल्ली में हुआ और ये बहादुर शाह ज़फर का कोतवाल था

1857 में बहादुर शाह ज़फर ने भी मुगलिया राज दिल्ली में बचाने के लिए अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ी, हार गया तो अंग्रेज दिल्ली के कोतवाल यानि गयासुद्दीन ग़ाज़ी को फांसी पर चढाने के लिए खोजने लगे जान बचाकर पहले गयासुद्दीन ग़ाज़ी आगरा भागा, फिर वहां से इलाहबाद भाग गया

और अपना नाम इसने गंगाधर रख लिया, ताकि अंग्रेज इसे खोज न सके अब हिन्दुओ में सरनेम भी होता है, इसने पहले कॉल लगाया, फिर डर गया की लोग खानदान के बारे में पूछेंगे, तो इसने बिलकुल ही नया सरनेम “नेहरू” रख लिया, नेहरू भारत में किसी भी ब्राह्मण तो छोड़िये किसी भी ने हिन्दू का नाम नहीं होता, ये शुद्ध फर्जी सरनेम है

गयासुद्दीन ग़ाज़ी के 2 बेटे हुए, कांग्रेस 1 को मोतीलाल नेहरू बताती है, मोतीलाल की तस्वीर आपने देखी होगी पर देखिये गयासुद्दीन ग़ाज़ी के दूसरे बेटे की तस्वीर, जो की नेहरू का चाचा भी था

ये तस्वीर भी इलाहबाद के आनंद भवन में लगी हुई है, एक छोटा बच्चा भी बता देगा की ये शख्स कोई मुस्लिम है, पर कांग्रेस के मुताबिक ये भी हिन्दू ब्राह्मण है, पंडित है नोट : इस आनंद भवन का भी असली नाम “इशरत मंजिल” है, इसका मालिक मुबारक अली नाम का शख्स था  नोट : नेहरू ने भी खुद कहा था की, हिन्दू तो वो दुर्घटना से है, पढाई लिखे से वो अंग्रेज (ईसाई) है, और संस्कारो से एक मुस्लिम

और आप नेहरू के दादा और चाचा की तस्वीर जो आनंद भवन में आज भी लगी है उसे भी देख सकते है अब आप अंदाजा लगाइये की इस देश को कितना मुर्ख बनाया गया 1 जिन्नाह पाकिस्तान ले गया और दूसरा जिन्नाह अर्थात नेहरू के भेष में एक जिहादी भारत पर कब्ज़ा करने बैठ गया

 

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