6 गोली लगने के बाद भी भारी पड़ गया पूरी पाकिस्तानी सैनिक टुकड़ी पर यह भारत माता का पूत

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आज हम आपको एक ऐसे वीर कि गाथा के बारें में बताने वालें है, जिसने अकेले ही पूरे पकिस्तान को झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। उसे इस वीरता के लिए भारत के सबसे बड़े पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। हम बात कर रहे हैं टाइगर हिल टॉप विजेता परमवीर चक्र का सम्मान पाने वाले 18 ग्रिनेडियर के वीर योगेन्द्र सिंह यादव की।

यह एक सच कहानी है 1999 के कारगिल युद्ध कि। योगेन्द्र सिंह यादव कि 5 मई 1999 को शादी हुई थी और शादी के बाद 20 मई 1999 को वह वापिस जम्मू कश्मीर में तैनात हुए थे। वहां उन्हें पता चला की उनकी बटालियन 18 ग्रिनेडियर द्रास सेकटर की सबसे ऊँची पहाड़ी तोरोलिंग पर लड़ाई लड़ रही हैं। उन्होंने द्रास सेकटर में तोरोलिंग पहाड़ी पर अपने जवानों के साथ युद्ध किया, उस लड़ाई के अन्दर उनके बटालियन के 2 अफसर, 2 जे.सी.ओ और 22 जवान वीरगति को प्राप्त हुए पर फिर भी 12 जून 1999 को उन्होंने तोरोलिंग पहाड़ी पर तिरंगा फहरा दिया गया।

इस विजय के बाद उनकी बटालियन को द्रास सेक्टर की सबसे ऊँची चोटी टाइगर हिल टॉप को कैप्चर करने का हुक्म दिया गया। इस हमले के लिए उनके बटालियन के कमांडिंग अफसर कुशाल चंद ठाकुर ने बटालियन में से एक नई घातक टुकड़ी का निर्माण किया, उनमे से एक थे योगेन्द्र सिंह यादव । और आप उनसे पूछेंगे तो वह यही कहेंगे कि –

मैं बहुत भाग्यशाली रहा कि मेरा चुनाव उस टुकड़ी में हुआ, और सबसे बड़े सौभाग्य की बात की मुझे उस टीम का सबसे आगे चलने वाला सदस्य भी बनाया गया। ”

2 जुलाई 1999 को इस टुकड़ी ने हिल टॉप पर चढ़ाई करने की तैयारी शरू कर दी और उसी दिन शाम को साढ़े 6 बजे टुकड़ी ने चढ़ना भी शुरू कर दिया I तीन दिन और दो रात की लगातार यात्रा करने के बाद 5 जुलाई 1999 को सुबह यह टुकड़ी टाइगर हिल टॉप पर चढ़ पाई। इस टुकड़ी ने रस्सों का सहारा लेकर, एक दूसरे का सहारा लेकर, बर्फीली आंधियां का सामना करते हुए यह मुकाम हासिल किया था। उसी क्षण उनपर दुश्मन का फायर शुरू हो गया। रास्ते के दोनों तरफ नाले थे और नालों में दुश्मनों का बंकर थे, जो उन्हें अँधेरे की वजह से दिख नहीं पाए थे। लेकिन पांच घंटे की फायरिंग में दुश्मन यह अंदाजा नहीं लगा पाया कि यहाँ इंडियन आर्मी के कितने जवान आये हैं।

इन सात जवानों ने यह दिखा दिया कि यहाँ पर 7 जवान नहीं बल्कि 700 जवान हैं। फिर दुश्मन कि एक छोटी टुकड़ी यह पता लगाने में कामयाब हो गयी कि वहां केवल ७ हिन्दुतानी है। इसके बाद इस टुकड़ी पर तक़रीबन 70 आदमी अटैक करने के लिए ऊपर से आए। आगे हुए हमले में 6 भारतीय जवान शहीद हो गए, पर उस से पहले उन्होंने दुश्मन के 35 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस हमले में हमारी कहानी के नायक को भी गोलियां लगी और वह बेहोश हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वह दुश्मन कि सारी बातें सुन रहे थे, और सही मौके की तलाश में थे। वह इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि दुश्मन जैसे हि इक्कठा हो, वह मौका देखकर उठे और उन्हें मार दें। उन्होंने जब सुना कि दुश्मन नीचे स्तिथ हुन्दुस्तान कि एक पोस्ट को तबाह करने कि तरकीब बना रहा है, तो उनके अन्दर कही से एक नया जोश आ गया।

और हम आपको बता दें कि इस समय पर उनके पैर पर गोली, जांघ पर गोली, और बाजू में गोलियां लगी हुई थी। उनका सर पहले ही फटा हुआ था, खून बह रहा था।  लेकिन उनका दिल अभी भी पूरी ताकत से धड़क रहा था। दुश्मन के मन में जाते-जाते पता नहीं क्या आया, कि उन्होंने मृत शवों पर अँधा धुंध फायर किया और उस में इनकी छाती पर भी गोली लगी। पर किस्मत का कमाल देखिये उनकी छाती की जेब में पर्स रखा हुआ था और उसमें पांच-पांच के सिक्के रखे हुए थे।  सिक्के पर गोली लगी थी, और उनके हौसले अभी भी उतने ही बरकरार थे।

उनके अन्दर से एक आवाज़ आई कि अगर उन्हें अपने साथियों कि जान बचानी है तो येही मौका है उनके पास।  उनके पास जो हथगोला बचा हुआ था, उन्होंने उस ग्रेनेड को लिया और उसे दुश्मन के ऊपर फेंक दिया। सर्दी के कारण  सब ने कोट पहन रखे थे, और वह ग्रेनेड दुश्मन के पीछे टोपी में गिर गया। जब तक वह ग्रेनेड को निकाल पाते ग्रेनेड फट गया।  दुश्मन के खेमे में एकदम से खलबली मच गयी और उन्हें लगा कि फ़ौज वहां पहुँचने वाली है।  इसके बाद यादव ने मृत दुश्मन कि राइफल एक हाथ से चलाई और दनादन फायरिंग शुरू कर दी, जिस में उनके चार आदमियों को मौत हो गई।  उन्होंने ज़ख़्मी हालत में  कई दुश्मनों को मार गिराया, पर उन्हें यह पता नहीं लगने दिया कि वह अकेले है। उन्हें येही लगा कि से दूसरी टुकड़ी ऊपर आ गयी हैं

इस बहादुरी के बाद उन्हें नीचे करीब 500 मीटर जाना था। उन्होंने अपना घायल हाथ बेल्ट में बाँधा और नीचे नाले में लुडक गए। इस के बाद उन्होंने टीम कमांडर लेफ्टिनेंट बलवान सिंह और कैप्टन सचिन नेपालकर को आवाज दी तो उन्होंने यादव को नाले से ऊपर खींचा। उनकी हालत देखकर सब हैरान थे कि वह जिंदा कैसे बच गए। उन्होंने उन से कहा-

“सर मुझे कुछ नहीं हुआ हैं लेकिन यहाँ पर हमला होने वाला हैं !”

इस वीरता के लिए उन्हें भारत के सबसे बड़े पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया थाI क्या आपने पहले ऐसी बहादुरी कि कहानी कभी सुनी या पढ़ी है?

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